शहर में तेरे सब गुमनाम मिलते हैंहवाओं में ही अब पैग़ाम मिलते हैंबिछड़ने के ब’अद भी तुझ से ये है हालजिधर जाऊँ तेरे हमनाम मिलते हैं— karan singh rajput