अब तजरबा भी कर लिया पढ़ ली किताब भी
सब कुछ समझ गया हूँ हक़ीक़त भी ख़्वाब भी
मैंने बना के सब सेे रखी काम के हैं सब
मुझको चराग़ जानता है आफ़ताब भी
मैंने कहा था तुझ सेे ज़रा इंतिज़ार कर
अब देख हो गया हूँ न मैं कामयाब भी
जब दूर तुम हुए तो क़लम को उठा लिया
वरना तो दोस्त लाए थे मेरे शराब भी
मैंने भी काफ़ी कुछ दिया है इस जहान को
जब फ़्री रहे ख़ुदा करे मेरा हिसाब भी
जो लोग मानते नहीं शाइर 'तनोज' को
अब इस ग़ज़ल से मिल गया उनको जवाब भी
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