बूटी लगी है मुरझाने वफ़ा की
गुलशन में है पुकार-ओ-सर सबा की
कब तक चलेंगे जौर-ओ-ज़ुल्म ज़ालिम
होनी है मौत कल तेरे जफ़ा की
किसको है डर तिरे ज़ुल्मों का जाबिर
रंगत उतर चुकी तेरे असा की
अब तक यही अज़ल से है रिवायत
होती है इन्तिहा हर इब्तिदा की
धक्का दिया है बच्चों ने जो मुझको
आती है याद अपने बचपना की
माँगा करो ख़ुदास ही हमेशा
मिलनी जो है जज़ा हर इक दु'आ की
होता फ़ना है जो कहता अनलहक़
वाहिद सिफ़त जो है मेरे ख़ुदा की
साक़ी मरे कि उजड़े मय-कदा अब
मुझको है फ़िक्र "हैदर" मय-कदा की
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