बड़े आरोप हैं इस पर कि खा जाती है तन्हाई

कभी सनकी कभी पागल बना जाती है तन्हाई

मगर पहलू बदल कर के जो देखोगे तो पाओगे
कभी अरहत कभी बुद्धा बना जाती है तन्हाई

जो क़स
में रोज़ खाता हो हमेशा साथ जीने की
वही दिल तोड़ जाए तो रुला जाती है तन्हाई

बड़े ही स्वार्थी हैं सब बदलते हैं ज़रूरत पर
ये दुनिया के हक़ीक़त को बता जाती है तन्हाई

इरादा था मेरा जब ये कि कुछ बन के ही लौटूँगा
कभी थक हार कर बैठा चिढ़ा जाती है तन्हाई

भले कोसो इसे जितना भले ही गालियाँ दो तुम
मगर इंसान को ख़ुद से मिला जाती है तन्हाई

कहीं जो ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलता किताबों में
वो जीवन का अहम दर्शन दिखा जाती है तन्हाई

— Updesh 'Vidyarthi'

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Sach Shayari

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