
ये कब कहते हैं कि आ कर हम को गले लगा ले वो
मिल जाए तो रस्मन ही बस हाथ मिला ले काफ़ी है
इतने कहाँ नसीब कि इस से प्यास बुझाएँ खेल करें
दरिया हम जैसों को अपने पास बिठा ले काफ़ी है
— Vashu Pandey
Other sher from the same pen
Shers of child labour.
Voices in the same orbit
Poetry by feeling