mujhe to qatra hi hona bahut sataata hai | मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है

  - Waseem Barelvi

मुझे तो क़तरा ही होना बहुत सताता है
इसी लिए तो समुंदर पे रहम आता है

वो इस तरह भी मिरी अहमियत घटाता है
कि मुझ से मिलने में शर्तें बहुत लगाता है

बिछड़ते वक़्त किसी आँख में जो आता है
तमाम उम्र वो आँसू बहुत रुलाता है

कहाँ पहुँच गई दुनिया उसे पता ही नहीं
जो अब भी माज़ी के क़िस्से सुनाए जाता है

उठाए जाएँ जहाँ हाथ ऐसे जलसे में
वही बुरा जो कोई मसअला उठाता है

न कोई ओहदा न डिग्री न नाम की तख़्ती
मैं रह रहा हूँ यहाँ मेरा घर बताता है

समझ रहा हो कहीं ख़ुद को मेरी कमज़ोरी
तो उस से कह दो मुझे भूलना भी आता है

  - Waseem Barelvi

Nigaah Shayari

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