Ibrahim Ashk

Top 10 of Ibrahim Ashk

    ग़ज़ल हो गई जब भी सोचा तुम्हें
    फ़साने बने जब भी लिक्खा तुम्हें

    कभी धूप हो तुम कभी चाँदनी
    समझ कर भी कोई न समझा तुम्हें

    ग़रज़ कोई सूरज से हम को नहीं
    सहर हो गई जब भी देखा तुम्हें

    मुझे अपने दिल पर बड़ा नाज़ है
    बड़े नाज़ से जिस ने रक्खा तुम्हें

    कभी मेरी आँखों में झाँको ज़रा
    यहाँ कोई तुम सा मिलेगा तुम्हें

    ये थी 'अश्क' साहब की दीवानगी
    थे तुम रू-ब-रू फिर भी ढूँडा तुम्हें
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    Ibrahim Ashk
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    मुझे न देखो मिरे जिस्म का धुआँ देखो
    जला है कैसे ये आबाद सा मकाँ देखो

    न चाट जाए कड़ी धूप सुर्ख़ियाँ लब की
    शजर की छाँव किसी घर का साएबाँ देखो

    मोहब्बतों की तसल्ली बहुत ज़रूरी है
    सितम के शहर में इक यार-ए-मेहरबाँ देखो

    कोई भरोसा नहीं अब्र के बरसने का
    बढ़ेगी प्यास की शिद्दत न आसमाँ देखो

    तुम्हारा वक़्त नहीं सच के बोलने वालो
    न चुप रहोगे तो कट जाएगी ज़बाँ देखो

    कोई हसीन अभी रास्ते से गुज़रा है
    लगाओ आँख से क़दमों के जो निशाँ देखो

    हुनर तो रोज़ ही बिकता है चंद सिक्कों में
    ख़रीद ले न ज़माना तुम्हें अमाँ देखो

    नहीं है तुम में सलीक़ा जो घर बनाने का
    तो 'अश्क' जाओ परिंदों के आशियाँ देखो
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    Ibrahim Ashk
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    करें सलाम उसे तो कोई जवाब न दे
    इलाही इतना भी उस शख़्स को हिजाब न दे

    तमाम शहर के चेहरों को पढ़ने निकला हूँ
    ऐ मेरे दोस्त मिरे हाथ में किताब न दे

    ग़ज़ल के नाम को बदनाम कर दिया उस ने
    कुछ और दे मिरे साक़ी मुझे शराब न दे

    मैं तुझ को देख के तेरे भरम को जान सुकूँ
    इक आदमी हूँ ज़रा सोच ऐसी ताब न दे

    वो मिल न पाए अगर मुझ को इस ज़माने में
    तो ऐसी हूर का दुनिया में कोई ख़्वाब न दे

    ये मेरे फ़न की तलब है कि दिल की बात कहूँ
    वो 'अश्क' दे कि ज़माने को इंक़िलाब न दे
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    Ibrahim Ashk
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    ज़िंदगी वादीसहरा का सफ़र है क्यूँ है
    इतनी वीरान मिरी राह-गुज़र है क्यूँ है

    तू उजाले की तरह आ के लिपट जा मुझ से
    इक अँधेरा सा इधर और उधर है क्यूँ है

    रोज़ मिलता है कोई दिल को लुभाने वाला
    फिर भी तू ही मिरा महबूब-ए-नज़र है क्यूँ है

    घर की तस्वीर भी सहरा की तरह है लेकिन
    फ़र्क़ इतना है कि दीवार है दर है क्यूँ है

    जिस को देखूँ वही बर्बाद हुआ जाता है
    आदमी क्या है मोहब्बत का खंडर है क्यूँ है

    मैं समुंदर हूँ मगर प्यास है क़िस्मत मेरी
    मेरे दामन में अगर 'अश्क' गुहर है क्यूँ है
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    Ibrahim Ashk
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    दुनिया लुटी तो दूर से तकता ही रह गया
    आँखों में घर के ख़्वाब का नक़्शा ही रह गया

    उस के बदन का लोच था दरिया की मौज में
    साहिल से मैं बहाव को तकता ही रह गया

    दुनिया बहुत क़रीब से उठ कर चली गई
    बैठा मैं अपने घर में अकेला ही रह गया

    वो अपना अक्स भूल के जाने लगा तो मैं
    आवाज़ दे के उस को बुलाता ही रह गया

    हमराह उस के सारी बहारें चली गईं
    मेरी ज़बाँ पे फूल का चर्चा ही रह गया

    कुछ इस अदास आ के मिला हम से 'अश्क' वो
    आँखों में जज़्ब हो के सरापा ही रह गया
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    Ibrahim Ashk
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    उस की इक दुनिया हूँ मैं और मेरी इक दुनिया है वो
    दश्त में तन्हा हूँ मैं और शहर में तन्हा है वो

    मैं भी कैसा आइना हूँ आइना-दर-आइना
    दूर तक चेहरा-ब-चेहरा बस नज़र आता है वो

    उस की ख़ुश-बू से महक कर फूल बन जाता है दिल
    मौसम-ए-गुल की तरह आता है वो जाता है वो

    ज़िंदगी अपनी मुसलसल चाहतों का इक सफ़र
    इस सफ़र में बार-हा मिल कर बिछड़ जाता है वो

    ख़्वाब क्या है इक खंडर है ये खंडर कितना हसीं
    इस खंडर में सैर करने के लिए आता है वो

    मैं सरापा आरज़ू हूँ आरज़ू-ए-ना-तमाम
    मुझ को हर मंज़िल से आगे की ख़बर देता है वो

    हुस्न क्या है इक ग़ज़ल है 'अश्क' इक ताज़ा ग़ज़ल
    जाम है मीना है वो साग़र है वो सहबा है वो
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    Ibrahim Ashk
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    रात भर तन्हा रहा दिन भर अकेला मैं ही था
    शहर की आबादियों में अपने जैसा मैं ही था

    मैं ही दरिया मैं ही तूफ़ाँ मैं ही था हर मौज भी
    मैं ही ख़ुद को पी गया सदियों से प्यासा मैं ही था

    किस लिए कतरा के जाता है मुसाफ़िर दम तो ले
    आज सूखा पेड़ हूँ कल तेरा साया मैं ही था

    कितने जज़्बों की निराली ख़ुशबुएँ थीं मेरे पास
    कोई उन का चाहने वाला नहीं था मैं ही था

    दूर ही से चाहने वाले मिले हर मोड़ पर
    फ़ासले सारे मिटाने को तड़पना मैं ही था

    मेरी आहट सुनने वाला दिल न था दुनिया के पास
    रास्ते में 'अश्क' बे-मक़्सद जो भटका मैं ही था
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    Ibrahim Ashk
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    शीशे का आदमी हूँ मिरी ज़िंदगी है क्या
    पत्थर हैं सब के हाथ में मुझ को कमी है क्या

    अब शहर में वो फूल से चेहरे नहीं रहे
    कैसी लगी है आग ये बस्ती हुई है क्या

    मैं जल रहा हूँ और कोई देखता नहीं
    आँखें हैं सब के पास मगर बेबसी है क्या

    तुम दोस्त हो तो मुझ से ज़रा दुश्मनी करो
    कुछ तल्ख़ियाँ न हों तो भला दोस्ती है क्या

    ऐ गर्दिश-ए-तलाश न मंज़िल न रास्ता
    मेरा जुनूँ है क्या मिरी आवारगी है क्या

    ख़ुश हो के हर फ़रेब ज़माने का खा लिया
    ये दिल ही जानता है कि दिल पर बनी है क्या

    दो बोल दिल के हैं जो हर इक दिल को छू सकें
    ऐ 'अश्क' वर्ना शे'र हैं क्या शा'इरी है क्या
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    Ibrahim Ashk
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    तिरी ज़मीं से उठेंगे तो आसमाँ होंगे
    हम ऐसे लोग ज़माने में फिर कहाँ होंगे

    चले गए तो पुकारेगी हर सदा हम को
    न जाने कितनी ज़बानों से हम बयाँ होंगे

    लहू लहू के सिवा कुछ न देख पाओगे
    हमारे नक़्श-ए-क़दम इस क़दर अयाँ होंगे

    समेट लीजिए भीगे हुए हर इक पल को
    बिखर गए जो ये मोती तो राएगाँ होंगे

    उचाट दिल का ठिकाना किसी को क्या मालूम
    हम अपने आप से बिछड़े तो फिर कहाँ होंगे

    हैं अपनी मौज के बहते हुए समुंदर हम
    तमाम दश्त-ए-जुनूँ में रवाँ-दवाँ होंगे

    ये बज़्म-ए-यार है क़ुर्बान जाइए इस पर
    सुना है 'अश्क' यहाँ दिल सभी जवाँ होंगे
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    Ibrahim Ashk
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    देखा तो कोई और था सोचा तो कोई और
    जब आ के मिला और था चाहा तो कोई और

    उस शख़्स के चेहरे में कई रंग छुपे थे
    चुप था तो कोई और था बोला तो कोई और

    दो-चार क़दम पर ही बदलते हुए देखा
    ठहरा तो कोई और था गुज़रा तो कोई और

    तुम जान के भी उस को न पहचान सकोगे
    अनजाने में वो और है जाना तो कोई और

    उलझन में हूँ खो दूँ कि उसे पा लूँ करूँ क्या
    खोने पे वो कुछ और है पाया तो कोई और

    दुश्मन भी है हमराज़ भी अंजान भी है वो
    क्या 'अश्क' ने समझा उसे वो था तो कोई और
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    Ibrahim Ashk
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