मोहब्बत से मोहब्बत मिल गई जैसे
कि सहरा में कली इक खिल गई जैसे
न जाने कैसे तुम बिन जी रहा था मैं
समझ लो हर घड़ी मुश्किल गई जैसे
चली थी रेल इक सीटी बजाए बिन
जो मेरे दिल से तेरे दिल गई जैसे
न निकला लफ़्ज़ उसके रू-ब-रू मेरा
मेरे वो होंठ दोनों सिल गई जैसे
ग़ज़ल को मेरी तूने गुनगुनाया जब
लगा मेरी हाँ में हाँ मिल गई जैसे
उसे इतना क़रीबी क्यो बनाया 'कब्क'
गया इक शख़्स तो महफ़िल गई जैसे
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