Nida Fazli

Top 10 of Nida Fazli

    कोई नहीं है आने वाला फिर भी कोई आने को है
    आते जाते रात और दिन में कुछ तो जी बहलाने को है

    चलो यहाँ से अपनी अपनी शाख़ों पे लौट आए परिंदे
    भूली-बिसरी यादों को फिर तन्हाई दोहराने को है

    दो दरवाज़े एक हवेली आमद रुख़्सत एक पहेली
    कोई जा कर आने को है कोई आ कर जाने को है

    दिन भर का हंगामा सारा शाम ढले फिर बिस्तर प्यारा
    मेरा रस्ता हो या तेरा हर रस्ता घर जाने को है

    आबादी का शोर-शराबा छोड़ के ढूँडो कोई ख़राबा
    तन्हाई फिर शम्अ' जला कर कोई हर्फ़ सुनाने को है
    Read Full
    Nida Fazli
    10
    4 Likes
    नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
    कुछ दिन शहर में घू
    में लेकिन अब घर अच्छा लगता है

    मिलने-जुलने वालों में तो सब ही अपने जैसे हैं
    जिस से अब तक मिले नहीं वो अक्सर अच्छा लगता है

    मेरे आँगन में आए या तेरे सर पर चोट लगे
    सन्नाटों में बोलने वाला पत्थर अच्छा लगता है

    चाहत हो या पूजा सब के अपने अपने साँचे हैं
    जो मौत में ढल जाए वो पैकर अच्छा लगता है

    हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में
    जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है
    Read Full
    Nida Fazli
    9
    19 Likes
    दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए
    जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए

    यूँ तो क़दम क़दम पे है दीवार सामने
    कोई न हो तो ख़ुद से उलझ जाना चाहिए

    झुकती हुई नज़र हो कि सिमटा हुआ बदन
    हर रस-भरी घटा को बरस जाना चाहिए

    चौराहे बाग़ बिल्डिंगें सब शहर तो नहीं
    कुछ ऐसे वैसे लोगों से याराना चाहिए

    अपनी तलाश अपनी नज़र अपना तजरबा
    रस्ता हो चाहे साफ़ भटक जाना चाहिए

    चुप चुप मकान रास्ते गुम-सुम निढाल वक़्त
    इस शहर के लिए कोई दीवाना चाहिए

    बिजली का क़ुमक़ुमा न हो काला धुआँ तो हो
    ये भी अगर नहीं हो तो बुझ जाना चाहिए
    Read Full
    Nida Fazli
    8
    4 Likes
    दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है
    मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है

    अच्छा सा कोई मौसम तन्हा सा कोई आलम
    हर वक़्त का रोना तो बे-कार का रोना है

    बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
    किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है

    ये वक़्त जो तेरा है ये वक़्त जो मेरा है
    हर गाम पे पहरा है फिर भी इसे खोना है

    ग़म हो कि ख़ुशी दोनों कुछ दूर के साथी हैं
    फिर रस्ता ही रस्ता है हँसना है न रोना है

    आवारा-मिज़ाजी ने फैला दिया आँगन को
    आकाश की चादर है धरती का बिछौना है
    Read Full
    Nida Fazli
    7
    31 Likes
    अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
    रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

    पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
    अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

    वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से
    किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं

    चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
    सोचते रहते हैं किस राह-गुज़र के हम हैं

    हम वहाँ हैं जहाँ कुछ भी नहीं रस्ता न दयार
    अपने ही खोए हुए शाम ओ सहर के हम हैं

    गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
    हर क़लमकार की बे-नाम ख़बर के हम हैं
    Read Full
    Nida Fazli
    6
    16 Likes
    सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो
    सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो

    किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं
    तुम अपने आप को ख़ुद ही बदल सको तो चलो

    यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
    मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो

    कहीं नहीं कोई सूरज धुआँ धुआँ है फ़ज़ा
    ख़ुद अपने आप से बाहर निकल सको तो चलो

    यही है ज़िंदगी कुछ ख़्वाब चंद उम्मीदें
    इन्हीं खिलौनों से तुम भी बहल सको तो चलो
    Read Full
    Nida Fazli
    5
    61 Likes
    कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
    कहीं ज़मीन कहीं आसमाँ नहीं मिलता

    तमाम शहर में ऐसा नहीं ख़ुलूस न हो
    जहाँ उमीद हो इस की वहाँ नहीं मिलता

    कहाँ चराग़ जलाएँ कहाँ गुलाब रखें
    छतें तो मिलती हैं लेकिन मकाँ नहीं मिलता

    ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं
    ज़बाँ मिली है मगर हम-ज़बाँ नहीं मिलता

    चराग़ जलते ही बीनाई बुझने लगती है
    ख़ुद अपने घर में ही घर का निशाँ नहीं मिलता
    Read Full
    Nida Fazli
    4
    37 Likes
    हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
    और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है
    Nida Fazli
    3
    47 Likes