ढलती सी ज़िन्दगी है चलो हम दु'आ करें
इक दूसरे के हक़ में ज़रा इल्तिजा करें
मज़हब ने कब सिखाया है आपस में बैर हो
क्यूँ हम कभी किसी के लिए बद्दुआ करें
अब आप ने ही माना है ज़ालिम को हुक्मरां
अब कोई हक़ नहीं है कि अच्छा बुरा करें
ये कह के घर से उसने निकाला है माई को
निकलें यहाँ से आप कहीं और रहा करें
मालूम है हमीं पे ज़माने की है नज़र
फिर क्यूँ के जान बूझ के कोई ख़ता करें
वाक़िफ़ नहीं हैं अब के सुख़न-वर लबों से आप
इश्क़-ए-मिज़ाजी छोड़ भी, ग़ज़लें कहा करें
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