जो लड़का मेरे अंदर है
खाकर के बैठा ठोकर है
घर के बाहर सब दफ़्तर है
दफ़्तर के बाहर सब घर है
मेरे शाना तेरा सर है
क्यूँँ ऐसा लगता अक्सर है
इतना नाज़ुक दिल है मेरा
जितने इक तितली के पर है
मुझ सेे पूछो तो मर जाना
ज़िंदा रहने से बेहतर है
किसने बस्ता छीना इनसे
क्यूँँ इन हाथों में पत्थर है
डरने न लगे डरने से ये
मुझको मेरे डर का डर है
संभव कैसे है तुम बोलो
दो आँखें है सौ मंज़र है
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