tum apne lab pe kabhi harf-e-muddaa na rakho | तुम अपने लब पे कभी हर्फ़-ए-मुद्दआ न रखो

  - divya 'sabaa'

तुम अपने लब पे कभी हर्फ़-ए-मुद्दआ न रखो
फ़ज़ा-शनास हो दहलीज़ पर दिया न रखो

ये कह के रात के आँचल में छुप गया सूरज
बहुत तवील उमीदों का सिलसिला न रखो

वो रूठ जाए तो जीना मुहाल हो जाए
किसी से इतना ज़ियादा भी वास्ता न रखो

ख़ुदा-ए-ख़्वास्ता पढ़ ले कोई बचा के नज़र
बुरा न मानो तो ख़त मेज़ पर खुला न रखो

नज़र से दूर अगर हों तो कोई बात नहीं
दिलों के बीच 'सबा' इतना फ़ासला न रखो

  - divya 'sabaa'

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