तुम अपने लब पे कभी हर्फ़-ए-मुद्दआ न रखो
फ़ज़ा-शनास हो दहलीज़ पर दिया न रखो
ये कह के रात के आँचल में छुप गया सूरज
बहुत तवील उमीदों का सिलसिला न रखो
वो रूठ जाए तो जीना मुहाल हो जाए
किसी से इतना ज़ियादा भी वास्ता न रखो
ख़ुदा-ए-ख़्वास्ता पढ़ ले कोई बचा के नज़र
बुरा न मानो तो ख़त मेज़ पर खुला न रखो
नज़र से दूर अगर हों तो कोई बात नहीं
दिलों के बीच 'सबा' इतना फ़ासला न रखो
As you were reading Shayari by divya 'sabaa'
our suggestion based on divya 'sabaa'
As you were reading undefined Shayari