एक एहसान कर भी सकते थे
ख़ुद को आसान कर भी सकते थे
ग़ैर-वाजिब तो थी मुलाक़ातें
पर मेरी जान कर भी सकते थे
तुम न लौटोगे तय हुआ था मगर
हम को हैरान कर भी सकते थे
इश्क़ इज़हार बिन तड़प के मरा
इसका ऐलान कर भी सकते थे
चंद उसूलों को बेच देते काश
ज़ीस्त आसान कर भी सकते थे
रंज उदासी के रख़्त में से कुछ
कम ये सामान कर भी सकते थे
ख़ुद-कुशी फ़ाइदे गिनाती रही
हम ये नुक़सान कर भी सकते थे
दिन में इक बार कम से कम ‘मौजी’
इष्ट का ध्यान कर भी सकते थे
Read Full