ab ke bikhra to main yakjaa nahin ho paaooñga | अब के बिखरा तो मैं यकजा नहीं हो पाऊँगा

  - Rahul Jha

अब के बिखरा तो मैं यकजा नहीं हो पाऊँगा
तेरे हाथों से भी वैसा नहीं हो पाऊँगा

मुझ को बीमार करेगी तिरी आदत इक दिन
और फिर तुझ से भी अच्छा नहीं हो पाऊँगा

ये तो मुमकिन है कि हो जाऊँ तिरा ख़ैर-अंदेश
हाँ मगर इस से ज़ियादा नहीं हो पाऊँगा

अब मिरी ज़ात में बस एक की गुंजाइश है
मैं हुआ धूप तो साया नहीं हो पाऊँगा

यूँँ तो मुश्किल ही बहुत है मिरा हाथ आना और
हाथ आया तो गवारा नहीं हो पाऊँगा

तू बड़ी देर से आया मुझे ज़िंदा करने
अब नमी पा के भी सब्ज़ा नहीं हो पाऊँगा

मुझ में इतनी नहीं तासीर मसीहाई की
ज़ख़्म भर सकता हूँ ईसा नहीं हो पाऊँगा

इन दिनों अक़्ल की चलती है हुकूमत दिल पे
मैं जो चाहूँ भी तुम्हारा नहीं हो पाऊँगा

इतना आबाद है तुझ से मिरे अंदर का शहर
तुझ से बिछड़ा भी तो सहरा नहीं हो पाऊँगा

  - Rahul Jha

Wajood Shayari

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