zehan-o-dil men jaane kya kya rakha hai | ज़हन-ओ-दिल में जाने क्या क्या रक्खा है

  - Tariq Faiz

ज़हन-ओ-दिल में जाने क्या क्या रक्खा है
इन दोनों को किसने उलझा रक्खा है

मुझ से आख़िर बोल पड़ा है आइना
इतना मैंने ख़ुद को तन्हा रक्खा है

दिल रहता है ऐसे मेरे सीने में
जैसे इसको ज़िंदा दफ़ना रक्खा है

सब की आँखों में होता है इक दरिया
मेरी आँखों में इक सहरा रक्खा है

समझा लेना ही अब दिल को बेहतर है
सो मैंने अब दिल को समझा रक्खा है

मैंने तेरी यादों को ज़िंदा रक्खा
और यादों ने मुझको ज़िंदा रक्खा है

  - Tariq Faiz

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