KARAN

Top 10 of KARAN

    घर से दफ़्तर और फिर दफ़्तर से घर काफ़ी है क्या
    ज़िन्दगी तू ही बता इतना सफ़र काफ़ी है क्या

    कौन समझेगा मेरी तन्हाइयों के मसअले
    है ज़माना यूँ तो मेरे साथ पर काफ़ी है क्या

    आजकल मेरे त'आक़ुब में हैं आँखें यार की
    इब्तिदाई इश्क़ में इतना असर काफ़ी है क्या

    जल के मरना चाहिए था गर्मी-ए-इख़लास में
    हैफ़ दीवाना हुआ ख़स्ता-जिगर काफ़ी है क्या

    हुस्न तुझ में और थोड़ी दिल-कशी दरकार है
    आतिशी-अबरू क़यामत-सी नज़र काफ़ी है क्या

    इश्क़ मेरे और तुझ को क्या वज़ीफ़ा चाहिए
    देख आख़िर हो गया मैं दर-ब-दर काफ़ी है क्या

    फिर अनासिर ने बदल ली सूरत-ए-तरतीब और
    आलम-ए-हस्ती हुआ ज़ेर-ओ-ज़बर काफ़ी है क्या

    बे-दिली से आए थे हम भी कभी सहराओं में
    दिल तो याँ लगने लगा अपना मगर काफ़ी है क्या

    हाँ कभी झुकता न था ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के सामने
    तेरे सजदों में झुका जाता है सर काफ़ी है क्या

    क्या करूँ ऐसा कि अपने दिल में वो रख ले मुझे
    ऐ करन ये शेर-गोई का हुनर काफ़ी है क्या
    Read Full
    KARAN
    10
    1 Like
    जहालतों का वो मातम मना के लौट गए
    ज़हीन लोग थे चेहरा छुपा के लौट गए

    न रास आई उन्हें रौनकें ज़माने की
    चराग़े-दहर वो सारे बुझा के लौट गए

    अजीब किस्म के ताजिर थे वो मेरे भाई
    बिका न कुछ तो दुकानें बढ़ा के लौट गए

    सियासतों का ये धंधा कमाल है साहिब
    तरह तरह के भरोसे दिला के लौट गए

    रक़ाबतों के ये कैसे उसूल थे वो भी
    जो बुझ सके न तो हम को जला के लौट गए

    न सिरफ़िरा कोई पाओगे आप हम जैसा
    फ़राज़ो-रुतबा-ओ-शोहरत लुटा के लौट गए

    करन ये बात तो सच है कि तू दीवाना है
    मगर वो लोग जो दामन बचा के लौट गए
    Read Full
    KARAN
    9
    2 Likes
    "एक लड़की"
    बुलंद क़ामत की एक लड़की
    बिखेरती खुशबुएँ बदन की
    मेरी निगाहों की रहगुज़र से
    गुज़र गई है
    गरीब-मुफ़लिस किसी कुटी
    का है चाँद शायद
    है ख़ूब-सूरत, फ़टे-पुराने
    लिबास में भी बला की सुंदर
    ज़रा सा मेरे क़रीब आ कर
    हसीं लबों से यूँ मुस्कुरा कर
    तमाम आलम को ख़ुशबुओं से
    वो भर गई है
    जबीं कुशादा चमक रही है
    कमर भी उस की है शाख जैसी
    लचक रही है
    लबों पे बिखरा हुआ तबस्सुम
    सियाह गेसू भी उस बदन से
    लिपट रहे हैं
    यूँ जैसे कोई शजर से
    लिपटी हो बेल जैसे
    क़दम-क़दम पे
    ज्यूँ फूल खिलते हैं सुर्ख़
    गोया, जिधर गई है
    वो जिस्मे-नाज़ुक
    तराश जिस की हो गोया
    हीरा वो बेश-क़ीमत
    हर इक अदा में
    ग़ज़ब की है शबनमी लताफ़त
    किसी परी-वश से ख़ूबसरत
    सुख़नवरों के ख़याल-सी है
    कि सुर्ख़-रू उस हसीन की
    मैं मिसाल क्या दूँ
    गुलाल-सी है
    निगाह ख़ंजर, अदाएँ क़ातिल
    कमाल लहजा, बस इक नज़र से
    मेरे जिगर में उतर गई है
    मैं हूँ एक शाइ'र सो मुझ को
    उस
    में ग़ज़ल दिखी है
    लगा है मुझ को कि जैसे बादे-सबा
    उसे गुनगुना रही है
    मगर वो लड़की जिसे गुमाँ तक
    नहीं है शायद
    ये हुस्न उस पर ही बोझ
    बन जाएगा यक़ीनन
    उसे कहो कि
    नक़ाब में रक्खे हुस्नो-इस्मत
    वगरना पछताएगी बा'द में वो
    वो मर्द कहते हैं जो यहाँ पर
    वो ख़ुद को साबित करेंगे बेशक
    दिखाएँगे उस गरीब पर ही
    वो ज़ोर अपनी मर्दानगी का
    करेंगे ज़ाहिर वो
    पाक-दामन को तार कर के
    कि मर्द हैं हम
    न उस
    में उन को दिखेगा
    बेबस बुज़ुर्ग आँखों का
    इक सितारा
    उन्हें फ़क़त वो फ़टे लिबासों से
    झाँकता इक बदन दिखेगा
    हवस-कदे में, पड़ी मिलेगी
    बस एक उरियाँ वो लाश बन कर
    न मर्द की शक्ल में उन दरिंदों को
    उस
    में कोई बहन दिखेगी
    न माँ दिखेगी, न कोई बेटी
    न उन को उस
    में ग़ज़ल दिखेगी
    न शा'इरी ही
    Read Full
    KARAN
    8
    6 Likes
    अपनों के हाथों में खंज़र देखें हैं
    बिस्मिल अरमानों के लश्कर देखे हैं

    तुम ने इन आँखों का पानी देखा है
    इन आँखों ने रोज़ बवंडर देखे हैं

    गुलशन-गुलशन चीख़ सुनाई देती है
    ख़ून से लथपथ चिड़ियों के पर देखे हैं

    सहरा-सहरा ख़ाक उड़ाती उम्मीदें
    गर्द-आलूद हज़ारों मंज़र देखे हैं

    सुन ऐ इश्क़ औक़ात में रह तेरे जैसे
    हम ने जाने कितने ख़ुद-सर देखे हैं

    मेरे जैसा एक नहीं पाओगे तुम
    यूँ तो तुम ने ख़ूब क़लन्दर देखे हैं

    दोस्त लतीफ़ा-गोई है जिन का पेशा
    हम ने ऐसे लोग भी जर्जर देखे हैं

    इश्क़ की एवज़ पाए हैं ये ज़ख़्म मियाँ
    तू ने ऐसे ज़ख़्म रफ़ू-गर देखे हैं

    दर्द उठा कर भी सालिम हैं देख करन
    हम ने कुछ ऐसे भी पत्थर देखे हैं
    Read Full
    KARAN
    7
    4 Likes
    आया, क़रीब बैठ के कहने लगा कि बस
    इतना ही सिर्फ़ हम से तुम्हें प्यार था कि बस

    होंठो का लम्स था कि नशा था शराब का
    उस ने लबों पे आज यूँ बोसा रखा कि बस
    Read Full
    KARAN
    6
    6 Likes
    शरफ़ मिला न कभी चाँद देखने का हमें
    वो ख़ुश-नसीब हैं, जो तुझ को देखते होंगे
    KARAN
    5
    6 Likes
    टूटने की ज़द में, 'रिश्ता चल रहा है
    आज-कल दोनों में, 'झगड़ा चल रहा है

    रात भर आँसू, नहीं थमते हमारे
    चल रहा है ख़ैर! जैसा चल रहा है

    इश्क़, पहले था कभी, नामे-ख़ुदा पर
    अब दिखावा है, दिखावा चल रहा है

    हिर्स, मक्कारी, फ़रेब और नफ़रतों का
    जिस तरफ़ देखो, तमाशा चल रहा है

    थक चुका, पर मंज़िलों के ज़ौक़ में ही
    ये मुसाफ़िर, आबला-पा चल रहा है

    रात लहरा कर चली है, 'दश्त में अब
    ख़्वाब, आँखों में, 'सुहाना चल रहा है

    इश्क़ की शतरंज का है, वो 'पियादा
    चाल सीधी, हो के टेढ़ा चल रहा है

    सोचता हूँ, मैं भी उस के साथ हो लूँ
    क़ैस सहरा में, अकेला चल रहा है

    ऐ 'ख़ुदा! दुनिया तेरी, कितनी हसीं थी
    देख अब दुनिया में, क्या क्या चल रहा है

    हैं मुनाफ़े में, 'सियासत की दुकानें
    झूठ के दम पर, ये धन्धा चल रहा है

    ख़ाक हैं, सच्ची वफ़ा वाले जहाँ में
    बस अदाकारों का, सिक्का चल रहा है

    पूछते हो क्या, हमारा हाल दिलबर
    इश्क़ में जैसा है, अच्छा चल रहा है

    ख़ूब मुश्किल है, यूँ चलना रस्सियों पर
    बाज़ी-गर तेरा, 'भरोसा चल रहा है

    उस ने ही तौफ़ीक़ दी, तो मुतहर्रिक हैं
    वो चलाता है, खिलौना चल रहा है

    ऐ करन! अब ऐसे, दुनिया चल रही है
    अंधे के पीछे जूँ, अंधा चल रहा है
    Read Full
    KARAN
    4
    8 Likes
    दर्द का आलम सुनहरा, भेज दे
    काश माज़ी, लुत्फ़-ए-ईज़ा भेज दे

    वाक़या, दिल टूट जाने का मेरे
    और तेरे ज़ुल्मों का, क़िस्सा भेज दे
    Read Full
    KARAN
    3
    9 Likes
    ज़ीस्त की खोखली हैहात पे रह जाते हैं
    वो जो कमज़र्फ़ हैं, औक़ात पे रह जाते हैं

    ओढ़ लेती है शराफ़त की रिदा रोज़ सहर
    और इल्ज़ाम फ़क़त रात पे रह जाते हैं
    Read Full
    KARAN
    2
    12 Likes
    मत करो बे-लिबास, रहने दो
    इन ज़मीनों पे, घास रहने दो

    बढ़ते शहरों की, वहशतें रोको
    ये ज़मीं, ख़ुश-लिबास रहने दो
    Read Full
    KARAN
    1
    12 Likes