Yasir Khan

Top 10 of Yasir Khan

    हम ने कब चाहा कि वो शख़्स हमारा हो जाए
    इतना दिख जाए कि आँखों का गुज़ारा हो जाए

    हम जिसे पास बिठा लें वो बिछड़ जाता है
    तुम जिसे हाथ लगा दो वो तुम्हारा हो जाए

    तुम को लगता है कि तुम जीत गए हो मुझ से
    है यही बात तो फिर खेल दुबारा हो जाए

    है मोहब्बत भी अजब तर्ज़-ए-तिजारत कि यहाँ
    हर दुकाँ-दार ये चाहे कि ख़सारा हो जाए
    Read Full
    Yasir Khan
    10
    92 Likes
    इश्क़ से जाम से बरसात से डर लगता है
    यार तुम क्या हो कि हर बात से डर लगता है
    इश्क़ है इश्क़ कोई खेल नहीं बच्चों का
    वो चला जाए जिसे मात से डर लगता है

    मैं तिरे हुस्न का शैदाई नहीं हो सकता
    रोज़ बँटती हुई ख़ैरात से डर लगता है

    हम ने हालात बदलने की दुआ माँगी थी
    अब बदलते हुए हालात से डर लगता है

    दिल तो करता है कि बारिश में नहाएँ 'यासिर'
    घर जो कच्चा हो तो बरसात से डर लगता है
    Read Full
    Yasir Khan
    9
    15 Likes
    जिन को मालूम नहीं होगा दुआ का मतलब
    वो हमें ख़ाक बताएँगे ख़ुदा का मतलब

    वो ये कहते हैं मोहब्बत में सज़ा पाओगे
    और मैं ख़ूब समझता हूँ सज़ा का मतलब

    या'नी काँटों से मैं ख़ुशबू के मआ'नी पूछूँ
    या'नी अब आप बताएँगे वफ़ा का मतलब
    Read Full
    Yasir Khan
    8
    21 Likes
    ज़मीं बनाई गई आसमाँ बनाया गया
    बराए-इश्क़ ये सारा जहाँ बनाया गया

    तुम्हारी ना को ही आख़िर में हाँ बनाया गया
    यक़ीं के चाक पे रख कर गुमाँ बनाया गया

    तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी
    कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया

    हमारे साथ कोई दो क़दम भी चल न सका
    किसी के वास्ते इक कारवाँ बनाया गया

    बदल के देख लो तुम जिस्म चाहे औरों से
    वहीं पे ठीक है जिस को जहाँ बनाया गया

    किसी को जब भी ज़रूरत पड़ी सियाही की
    हमारा जिस्म जला कर धुआँ बनाया गया

    बस एक मैं ही था बस्ती में बोलने वाला
    तो सब से पहले मुझे बे-ज़बाँ बनाया गया
    Read Full
    Yasir Khan
    6
    9 Likes
    तुम्हारे काम अगर आए मुस्कुराने में
    तो कोई हर्ज नहीं मेरे टूट जाने में

    फ़रोख़्त हो गई हर शय जो दिल मकान में थी
    मैं इतना ख़र्च हुआ हूँ उसे कमाने में

    मैं अपनी जान से जाऊँगा है ये सच लेकिन
    उसे भी ज़ख़्म तो आएँगे आज़माने में

    वो एक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत न बिन सका मुझ से
    हज़ार बार मिटा हूँ जिसे बनाने में

    तुम्हें तो सिर्फ़ ख़बर है चराग़ जलने की
    हमारे हाथ जले हैं उसे जलाने में

    तुम्हारे वस्ल की मस्ती थी और मय-ख़ाना
    शराब ले के गया था शराब-ख़ाने में

    इमारतों में मोहब्बत का देवता है वो
    हमारे हाथ कटे हैं जिसे बनाने में
    Read Full
    Yasir Khan
    5
    8 Likes
    किसी ने हाल जो पूछा कभी मोहब्बत से
    लिपट के रोया बहुत देर उस से शिद्दत से

    हमारा साथ जो छूटा तो इस में हैरत क्या
    हमारे हाथ तो छूटे हुए थे मुद्दत से

    ये और बात कि बीनाई जा चुकी मेरी
    तुम्हारे ख़्वाब रखे हैं मगर हिफ़ाज़त से

    जब उस ने भीड़ में मुझ को गले लगाया था
    हर एक आँख मुझे तक रही थी हैरत से

    ये कारोबार-ए-सियासत बहुत ही अच्छा है
    बस आप झूट को बेचो बड़ी सदाक़त से
    Read Full
    Yasir Khan
    4
    4 Likes
    बना हुआ था कहीं आब-दान काग़ज़ पर
    थी इतनी प्यास कि रख दी ज़बान काग़ज़ पर

    किराएदार की आँखों में आ गए आँसू
    बनाए बैठे थे बच्चे मकान काग़ज़ पर

    तुम्हारे ख़त में नज़र आई इतनी ख़ामोशी
    कि मुझ को रखने पड़े अपने कान काग़ज़ पर

    तमाम उम्र गुज़ारी है धूप में शायद
    बना रहा है कोई साएबान काग़ज़ पर

    उठा लिया है क़लम अब तो मैं ने भी 'यासिर'
    उतार डालूँगा सारी थकान काग़ज़ पर
    Read Full
    Yasir Khan
    3
    10 Likes
    मिरी चीख़ों से कमरा भर गया था
    कोई कल रात मुझ में मर गया था

    बहुत मुश्किल है उस का लौट आना
    वो पूरी बात कब सुन कर गया था

    मुझे पहचानता भी है कोई अब
    मैं बस ये देखने ही घर गया था

    ज़माना जिस को दरिया कह रहा है
    हमारी आँख से बह कर गया था

    कई सदियों से सूखा पड़ रहा है
    यहाँ इक शख़्स प्यासा मर गया था

    हमारा बोझ था सर पर हमारे
    तुम्हारे साथ तो नौकर गया था

    ये मत समझा ख़ता किस से हुई थी
    बता इल्ज़ाम किस के सर गया था
    Read Full
    Yasir Khan
    2
    7 Likes
    आँखों को कुछ ख़्वाब दिखा कर मानेंगे
    आप हमारे होश उड़ा कर मानेंगे

    लगता है ये पानी बेचने वाले लोग
    हर बस्ती में आग लगा कर मानेंगे

    तुझ को छूने की चाहत में दीवाने
    शायद अपने हाथ जला कर मानेंगे

    तय तो ये था पिछली बातें भूलनी हैं
    आप मगर सब याद दिला कर मानेंगे

    घर का झगड़ा गर बाहर आ जाएगा
    बाहर वाले अंदर आ कर मानेंगे

    चाहे फिर आवाज़ चली जाए लेकिन
    हम उस को आवाज़ लगा कर मानेंगे

    घर पक्का करने की बातें करते हैं
    या'नी वो दीवार उठा कर मानेंगे
    Read Full
    Yasir Khan
    1
    13 Likes