हमको सब दीवानों ने समझाया है
जिस्म नहीं है यार मोहब्बत साया है
उसे देखकर पूछ रहा हूँ रब से मैं
सात दिनों में कैसे उसे बनाया है
हम तो दरिया हैं तूने उतना जाना
तेरे घड़े में जितना पानी आया है
नाच रहे हैं मोर जेठ दोपहरी में
उसकी ज़ुल्फ़ों ने पानी बरसाया है
वो इज़हार ए इश्क़ पे मुझ सेे कहती थी
पागल है क्या गांजा पी कर आया है
गहरे लोगों ने देखी गहरी बातें
सस्ता दर्शक सस्ती आँखें लाया है
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