जो हुदूद-ए-इश्क़ के उस पार दीवाने गए
खो दिआ ख़ुद को उन्होंने जो तुझे पाने गए
ज़िंदगी के हादसों से ज़ेहन जब घबरा गया
मय-कदे हम बेख़ुदी को होश में लाने गए
रास आया ही नहीं फिर और कोई मरहला
हम तेरे दिल से निकल कर सू-ए-ख़ुमख़ाने गए
इश्क़ में हुस्न-ए-बुताँ के शेख़ काफ़िर बन गए
शाम काटी मय-कदे में, सुब्ह बुतख़ाने गए
मिल ही जाएंँगे मआनी ज़ीस्त को जस्सर मेरी
गर मेरे भी नाम से कुछ शे'र पहचाने गए
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